ज़िन्दगी एक पहेली है
हर दिन नई नवेली है
बे-बसी खड़ी है हर मोड़ पर
मज़बूरी वक़्त की सहेली है
दरवेश है मज़ार की ,
सीढ़ी पे पड़ा है वो
आसमाँ ही छत है
उसकी कहाँ हवेली है
उड़ जाए धूल बनकर ,
काया मिट्टी की ढेली है
करोड़ों जाने लेने वाली
मौत, ये मौत अकेली है
बाबा है ब्रह्मचारी
शायद इसीलिए ,
चेला नहीं है कोई,
पर सैंकड़ों चेली है।
कुर्सी कलाकंद
है नेता गुलकंद,
चमचें है चाशनी,
जनता गुड़ की भेली है
क्या होती है मुसीबत,
बस जानेगा वो ही
भुक्तभोगी जो ,
मुसीबत जिसने झेली है
ये क्या मज़ाक 'कमल',
तेरे साथ हुआ है ,
किस्मत की लक़ीरें नहीं,
तेरी कोरी हथेली है।
लेख़क
कवि मुकेश 'कमल'
09781099423
हर दिन नई नवेली है
बे-बसी खड़ी है हर मोड़ पर
मज़बूरी वक़्त की सहेली है
दरवेश है मज़ार की ,
सीढ़ी पे पड़ा है वो
आसमाँ ही छत है
उसकी कहाँ हवेली है
उड़ जाए धूल बनकर ,
काया मिट्टी की ढेली है
करोड़ों जाने लेने वाली
मौत, ये मौत अकेली है
बाबा है ब्रह्मचारी
शायद इसीलिए ,
चेला नहीं है कोई,
पर सैंकड़ों चेली है।
कुर्सी कलाकंद
है नेता गुलकंद,
चमचें है चाशनी,
जनता गुड़ की भेली है
क्या होती है मुसीबत,
बस जानेगा वो ही
भुक्तभोगी जो ,
मुसीबत जिसने झेली है
ये क्या मज़ाक 'कमल',
तेरे साथ हुआ है ,
किस्मत की लक़ीरें नहीं,
तेरी कोरी हथेली है।
लेख़क
कवि मुकेश 'कमल'
09781099423
Waah waah ji.....
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