क्या है दूसरा और मुझसा कोई
मैं वो हूँ जिसको ना समझा कोई ॥
मैं किसको जाकर के अपना कहूँ
नहीं है यहाँ मेरा अपना कोई ॥
मैं हूँ वो मरुस्थल जहां पर कभी
ना बादल का टुकड़ा है बरसा कोई ॥
बस प्यार के चंद लफ़्ज़ों की ख़ातिर
ना जितना मेरे और तरसा कोई ॥
मैंने ढूँढा बहुत पर मिला ना 'कमल'
बड़ा दुःख मुझे मेरे दुःख सा कोई ॥
लेख़क
कवि मुकेश 'कमल'
09781099423